Aug 24, 2026

कमिश्नर दुर्गा नागपाल पर अवमानना मामले में प्रशासन ने दी सफाई, जानिये क्या है पूरा मामला

गोण्डा - उच्च न्यायालय द्वारा जारी आदेश के मामले में प्रशासन द्वारा सफाई देते हुए एक विज्ञप्ति के माध्यम से बताया गया है कि मामला लगभग 1997 से यानी 30 वर्षों से लंबित है और अत्यंत मूल्यवान सरकारी नजूल भूमि से संबंधित है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार इस भूमि पर वर्ष 2008 से बिना किसी विधिक प्रपत्र के एक साधारण कागज के आधार पर कथित पट्टा दर्शाया जा रहा है, जबकि भूमि सरकारी है और 1985 में पट्टा निरस्त करके सरकार के नाम पर दर्ज है। इस भूमि पर निजी विद्यालय भी संचालित हो रहा है। मंडलायुक्त द्वारा पदभार ग्रहण करने के बाद इस पुराने मामले की जानकारी मिलने पर उनका उद्देश्य केवल सरकारी भूमि के संरक्षण तथा सरकार की ओर से लंबित वाद में प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था।

इसी क्रम में, जब यह जानकारी नहीं मिल सकी कि संबंधित पीठासीन अधिकारी अवकाश से कब लौटेंगी अथवा अवकाश बढ़ेगा, तो मंडलायुक्त ने उन्हें केवल यह जानने के लिए फोन किया कि वे कब वापस लौट रही हैं। फोन पर न तो वाद के गुण-दोष पर चर्चा हुई, न किसी आदेश अथवा निर्णय के संबंध में कोई बात हुई और न ही वाद संख्या या वाद का नाम लेकर कोई चर्चा की गई। पीठासीन अधिकारी के पत्र में भी यह उल्लेख नहीं है कि मंडलायुक्त ने वाद का नाम या संख्या लेकर कोई बातचीत की थी। पत्र में मंडलायुक्त की “27 वर्ष की सेवा” का उल्लेख भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है, क्योंकि उनकी सेवा लगभग 16 वर्ष की है। यह भी महत्वपूर्ण है कि मंडलायुक्त से बात करने के लिए संदेश दिए जाने के बाद पीठासीन अधिकारी ने स्वयं उन्हें वापस फोन किया था।

मंडलायुक्त न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी गरिमा का पूर्ण सम्मान करती हैं। उनका उद्देश्य केवल लगभग 30 वर्षों से लंबित सरकारी भूमि से जुड़े मामले की प्रशासनिक स्थिति जानना और सरकारी हितों की प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करना था। पूरे घटनाक्रम को इसी तथ्यात्मक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

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