Jul 16, 2026

49 साल पहले हुए हरिहर शरण हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दो आरोपियों की हो चुकी है मौत

गोण्डा -  जिले के कर्नलगंज थानाक्षेत्र अंतर्गत बसेरिया गांव निवासी हरिहर शरण हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है। वर्ष 1977 में हरिहर शरण की हत्या हुई थी, उक्त हत्याकांड मामले में करीब 49 वर्ष बाद सुप्रीम कोर्ट ने पांच आरोपियों को बरी कर दिया है। फैसला आने से पूर्व दो हत्याभियुक्तों की मौत हो चुकी है। जबकि बचे तीन  आरोपी अदालत से बरी हो गए हैं।
जानकारी के मुताबिक जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ द्वारा जांच में गंभीर गड़बड़ियों और एफआईआर भेजने में देरी के आधार पर ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया तथा अदालत ने  कहा कि अभियोजन पक्ष इन आरोपियों को दोषी साबित करने में नाकाम रहा है। न्यायालय को अभियोजन प्रक्रिया में गंभीर खामियां भी मिलीं मसलन FIR को मजिस्ट्रेट तक भेजने में बिना वजह देरी हुई।

कोर्ट के मुताबिक पुलिस के एफआईआर दर्ज करने में विसंगतियां मिलीं,ऐसे हालात भी मिले जिनसे कथित चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी पर शक पैदा होता है। कोर्ट ने सूबेदार, हीरा लाल और राज बक्स की अपील मंज़ूर करते हुए ट्रायल कोर्ट व इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय रद्द कर दिया।  इन दोनों कोर्ट्स ने उन्हें IPC की धारा 148 और 302 (धारा 149 के साथ) के तहत दोषी ठहराया था. दो अन्य आरोपियों के खिलाफ अपीलें पहले ही उनकी मौत के कारण खत्म हो गई थीं. एक आरोपी की मौत हाई कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान हो गई। 
बताते चलें कि जिले करनैलगंज क्षेत्र के कचनापुर गांव के पास 28 जून 1977 को हरिहर शरण की हत्या कर दी गई थी, अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक पर मवेशियों के मेले से लौटते समय भाले, लाठी और अन्य हथियारों से लैस 6 आरोपियों ने हमला किया था। ट्रायल कोर्ट ने 1981 में आरोपियों को दोषी ठहराया था,हाईकोर्ट ने 2011 में इस सज़ा बरकरार रखी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि हमने गौर किया कि घटना के दिन शाम 7:10 बजे FIR दर्ज कराई गई, लेकिन मृतक का शव पूरी रात घटनास्थल पर ही पड़ा रहा। शव को न पुलिस और न ही परिवार ने उसे सुरक्षित किया, कोर्ट को इस बात का भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला कि घटना के लगभग दो दिन बाद, 30 जून को पोस्टमार्टम क्यों किया गया।

बेंच ने यह भी परखा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने इस बारे में अलग-अलग बातें कहीं कि FIR दर्ज कराने के लिए शिकायतकर्ता के साथ पुलिस स्टेशन कौन गया? शिकायतकर्ता का दावा था कि उसके साथ केवल एक गवाह गया था, जबकि वहीं पुलिस की जनरल डायरी में दो अन्य रिश्तेदारों की मौजूदगी भी दर्ज थी।

अदालत इस विसंगति ने अभियोजन पक्ष के मामले की बुनियाद पर ही चोट की, एक और अहम बात एफआईआर की सूचना थाने के अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट तक पहुंचने में देरी की थी। मुकदमा 28 जून को दर्ज की गई.,लेकिन यह मजिस्ट्रेट के पास 30 जून को पहुंची, अदालत ने इस पर कहा कि भले ही ये देरी केस को खराब नहीं करती, लेकिन यह तब अहम हो जाती है जब हालात के सूक्ष्म निरीक्षण से पता चले कि FIR का समय या अभियोजन पक्ष की कहानी में कई विसंगतियां है।

मामले में अदालत द्वारा अभियोजन पक्ष के केस की सच्चाई और विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि मुकदमें का समय बदला गया और बाद में अभियोजन पक्ष की कहानी को इस तरह से गढ़ा गया ताकि घटना स्थल पर कथित चश्मदीद गवाहों की मौजूदगी दिखाई जा सके।

बिना किसी ठोस कारण के लगभग 48 घंटे की देरी के बाद पोस्टमार्टम किया गया, मामले में अदालत द्वारा सवाल उठाया गया कि पुलिस स्टेशन के पास होने के बावजूद शव कई घंटों तक बिना किसी देखरेख के कैसे पड़ा रहा। अदालत द्वारा इस स्थिति को चौंकाने वाला और साफ तौर पर अजीब बताते हुए कहा गया कि मामला दर्ज होने के बाद भी जांच एजेंसी या पीड़ित के परिवार द्वारा शव को सुरक्षित रखने या संभालने की कोई कोशिश नहीं की ।

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