Dec 27, 2022

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे, कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और है । "जन्मदिन विशेष "

उस दिन दिल्ली में था और अचानक  पता चला कि अब तो सारे काम निपट गए हैं ?
मेट्रो स्टेशन पर टहलते हुए दिल्ली के बारे में सोचने लगा और दिल्ली के बारे सोचते ही “ ज़ौक़ साहब “ याद आए :

“इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए 'ज़ौक़' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़ कर “

तो जब 'ज़ौक़ " याद आए तो जेहन में ग़ालिब साहब भी तशरीफ़ ले आए और बोले “ जब यहाँ तक आ ही गए हो तो मेरी गली से भी गुजर लो “ .
बस मैं चल पड़ा पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान की उस पेचीदा कासिमजान गली की ओर जहां नुमाया है “असदुल्ला खां ग़ालिब “ की हवेली । चावड़ीबाजार मेट्रो स्टेशन के बाहर आप हिस्सा होते हैं दिल्ली-6 की गलियों में समाई एक अलग सी दुनिया का।

मेरा जवान रिक्शा गली दर गली चक्कर खाकर एक बुजुर्ग इमारत के सामने जा खड़ा हुआ ।जी हाँ यही तो थी ग़ालिब की हवेली ।इस भीड़-भाड़ वाली संकरी गली में एक दरवाजा खुला और मैं गालिब के साथ उन दिनों में पहुंच गया जहां जज्बात बेहद खूबसूरती से अल्फाजों से बयान होते थें।
डेढ़ कमरे की इस हवेली में घुसते ही ग़ालिब ने सवाल किया : 

“ पूछ्तें हैं वो के “ ‘ ग़ालिब ‘ “ कौन है ..?
कोई बतालाओ की हम बतलाएं क्या ? “

इस हवेली का कुल जमा इतिहास इतना सा है कि आगरा से आने के बाद अपने आखिरी नौ साल तक ग़ालिब इसी हवेली में रहें।1857 के गदर के बाद उजड़ी दिल्ली और मिर्ज़ा साहब की किसी औलाद के न बचने के चलते ये हवेली दुनिया की नजरों से ओझल हो गई।

गालिब की मौत के बाद हवेली में साल 1999 तक बाजार लगता था ।1999 के बाद सरकार ने इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया और इसका जीर्णोद्धार कराकर इसे वापस मुगल काल वाला रूप और गौरव देने की कोशिश की ।गालिब ने इसी हवेली में रहकर उर्दू और फारसी में 'दीवान' की रचना की थी।

हवेली को विशेष अंदाज देने के लिए लखौरी ईंटों, बालू पत्थर का प्रयोग किया गया है।लकड़ी की ड्योढ़ी(प्रवेश द्वार) बनाकर गालिब के समय के एहसास लाने की कोशिश की गई है।

वीरान सी पड़ी इस हवेली में हर तरफ अल्फ़ाजों और शेरों शायरी की खुशबू है।हवेली में घुसते ही एक दालान में ग़ालिब का बहुत खूबसूरत सा बुत है, जिसे श्री भगवान रामपुरे ने बनाया है:

“ उग रहा दर-ओ –दीवार पे सब्जा ग़ालिब
हम बयाबां में है और घर में बहार आई “

हवेली ग़ालिब की है तो जाहिर सी बात की जर्रे-जर्रे में ग़ालिब होंगे ।हर दीवार पर लगे ग़ालिब साहब के पोर्टेट, उनकी शायरी की इबारते , ग़ालिब चाचा की हस्तलिखित पांडुलिपियाँ आपको बहुत जल्द गालिबियत में रंग लेते हैं क्योकि :

“ है और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और “

ग़ालिब की हवेली सजी महफिल में ग़ालिब अकेले नहीं उनके साथी “ जौक, अबू जफर, मोमिन बहादुर शाह जफर भी शामिल हैं ।इन सब की पोर्टेट हमको कुछ कहते से लगते हैं :

“ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता “

और हाँ यहाँ गलिब के चंद कपड़े , उनके हुक्के और बर्तन आदि में ग़ालिब की यादों को संजोकर रखने की पुरजोर कोशिश करते से लगते हैं । हवेली के छोटे से अहाते में झूलते लाल हरे पर्दों के साए में खड़ा मैं शायद वही खड़ा था जहां से न जाने कितने हर्फो ने जन्म लिया और गलिब की कलम से निकल कर दुनिया के लिए अमर अफसाना बन गए।ये वहीं जर्रा था जहाँ इस जहां के सबसे काबिल शायर की हुक्के की गुडगुडाहट गूंजी थी । इस मुकाम ने देखा था बार बार उजड़ कर बस्ती दिल्ली ।

किसी कलमकार के लिए ये हवेली किसी धाम , किसी दरगाह से कम हरगिज नहीं हो सकती । अब बाकी कामों के लिए दिल्ली मुझे पुकार रही थी और मुझे जाना था ‘ ग़ालिब “ की गली छोड़ कर :

“ यह न थी हमारी किस्मत के विसाल-ए –यार होता
अगर और जीते रहते वही इंतिजार होता “

@मृदुल कपिल
लेखक की कानपुर की घातक कथाएं एवं मोहब्बत 24 कैरेट नाम की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है एवं चंद दिनों पूर्व "प्रताप नारायण मिश्र पुरस्कार" एवं केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान जी से "कानपुर गौरव सम्मान" प्राप्त हुआ है ।

No comments: