तत्कालीन SDM के फर्जी हस्ताक्षर से हुआ था खेल, तहसीलदार जांच में भी फर्जीवाड़ा उजागर, कोर्ट ने 1996 के आदेश को बताया प्रारम्भ से ही शून्य
गोण्डा - राजस्व न्यायालय के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और मिसाल बनने वाला फैसला अपर आयुक्त (द्वितीय), देवीपाटन मंडल, गोण्डा राजेश कुमार यादव की अदालत ने सुनाया है।
प्रकरण
निगरानी संख्या - C202408000001129 (केस नं. 1129/2024) सरकार उत्तर प्रदेश बनाम जगदम्बा प्रसाद आदि
अन्तर्गत धारा - 333, उ0प्र0 जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम, 1950
आदेश दिनांक - 28 अक्टूबर 2026
निगरानी के विरुद्ध आदेश - अपर जिलाधिकारी/अपर कलेक्टर गोण्डा द्वारा पारित आदेश दिनांक 16.10.2018
जानिये मामले के तथ्य
1. ग्राम नरायनपुर माझा, परगना ग्वारिच, तहसील करनैलगंज, जनपद गोण्डा में विनिमय वाद संख्या 16/25 में तत्कालीन उपजिलाधिकारी करनैलगंज ने आदेश दिनांक 19.07.1996 पारित कर ग्राम सभा की गाटा संख्या -
2336 रकबा 1.20 एकड़, 2481/0.20, 2482/0.04, 2473/1.00, 2479/1.81 एकड़ कुल 4.25 एकड़, जो राजस्व अभिलेख में चरागाह, ऊसर, बंजर व नवीन परती के खाते में दर्ज व गोण्डा-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित अति मूल्यवान भूमि है,
का विनिमय विपक्षी की गाटा संख्या 2549, 2544, 2426, 2427 आदि जो नदी, खादर, कंकड़ वाली अनुपजाऊ भूमि है, से कर दिया था।
2. इस आदेश के विरुद्ध ग्राम सभा की ओर से आपत्ति की गई कि यह आदेश कूटरचना (Fraud) पर आधारित है।
फर्जीवाड़े के विधिक साक्ष्य जो कोर्ट में साबित हुए
फर्जी हस्ताक्षर: तत्कालीन उपजिलाधिकारी करनैलगंज ज्ञान प्रकाश अवस्थी ने अपने शासकीय पत्र दिनांक 16.08.2003 में लिखित रूप से स्वीकार किया कि "प्रश्नगत वाद के आदेश पर मेरे हस्ताक्षर नहीं हैं, यह किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कूटरचित हस्ताक्षर बनाया गया है।"
तहसीलदार की जांच आख्या: तहसीलदार करनैलगंज ने अपनी जांच आख्या दिनांक 31.07.2003 में स्पष्ट लिखा कि धारा 161 के तहत विनिमय की समस्त औपचारिकताएं पूरी नहीं की गईं और आदेश विधि विरुद्ध है।
अभिलेख में हेराफेरी: गाटा संख्या 2528 रकबा 0.18 एकड़ विपक्षी के नाम खतौनी में कभी दर्ज ही नहीं था, जिसे फर्जी तरीके से खतौनी में बढ़ाकर विनिमय में शामिल कर लिया गया।
विधिक बहस:
सरकार/निगरानीकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि "Fraud vitiates all solemn acts" - कपट से प्राप्त कोई भी आदेश विधि की दृष्टि में शून्य होता है। धारा 161 में ग्राम सभा की बंजर/चरागाह भूमि का विनिमय नदी की भूमि से नहीं हो सकता। 1996 के आदेश में धारा 161(2) के तहत कलेक्टर की अनुमति भी नहीं ली गई।
विपक्षी की ओर से कहा गया कि 1996 के आदेश के विरुद्ध अपील की अवधि बीत चुकी है।
न्यायालय का विधिक निष्कर्ष
अपर आयुक्त ने विधि के सुस्थापित सिद्धांत "यदि आदेश कपट से प्राप्त किया गया है तो उसकी वैधता को कभी भी चुनौती दी जा सकती है, उस पर लिमिटेशन लागू नहीं होता" का उल्लेख करते हुए कहा -
> "अभिलेख पर उपलब्ध तहसीलदार आख्या, पूर्व SDM के पत्र व राजस्व अभिलेखों के अवलोकन से स्पष्ट है कि मूल आदेश दिनांक 19.07.1996 कूटरचना पर आधारित है। जब मूल आदेश ही कपटपूर्ण है तो उसके आधार पर पारित अपीलीय आदेश दिनांक 16.10.2018 भी टिकने योग्य नहीं है।"
अंतिम आदेश
न्यायालय ने निगरानी को स्वीकार करते हुए -
1. अपर जिलाधिकारी गोण्डा का आदेश दिनांक 16.10.2018 निरस्त किया।
2. मूल विनिमय आदेश दिनांक 19.07.1996 को प्रारम्भ से ही शून्य (Void ab initio) घोषित किया।
3. आदेश दिया कि सभी विनिमय गाटों को पूर्ववत यथास्थिति में ग्राम सभा व विपक्षी के नाम दर्ज किया जाए।
4. पत्रावली अवर न्यायालय को वापस भेजी।
लोगों का मानना है कि यह आदेश गोण्डा जनपद में ग्राम सभा की जमीनों पर हो रहे अवैध कब्जों के विरुद्ध एक बड़ी नजीर बनेगा।
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