Jun 7, 2026

ऋषियों,मुनियों की तपोभूमि जम्बू तीर्थ स्थल पर अंजनी कुमार दुबे ने कराया योगाभ्यास


करनैलगंज /गोण्डा - शनिवार को अयोध्या के पावन चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग स्थित प्रमुख तीर्थ स्थल जम्बू तीर्थ (अयोध्या पुरी के उत्तरी द्वार के रूप में वर्णित) पर योग एवं जलतत्त्व आधारित जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान मास्टर योग ट्रेनर अंजनी कुमार दुबे द्वारा 77 युवाओ को विभिन्न मुद्राओं में योगाभ्यास कराया गया ।  
आपको बताते चलें कि यह स्थल भारतीय योग परंपरा एवं आध्यात्मिक इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि यही वह पावन भूमि है जहाँ महर्षि अगस्त्य ने तपस्या की थी तथा बाद में दक्षिण भारत में योग एवं आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार हेतु प्रस्थान किया। इसी क्षेत्र में योग ऋषि तुंदला मुनि का आश्रम भी स्थित है, जिससे यह स्थान ऋषि परंपरा एवं योग साधना का केंद्र रहा है।
यह भूमि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से भी जुड़ी हुई है। इसी क्षेत्र के निकट 1857 की क्रांति के प्रमुख नायक कैप्टन गजाधर पांडे जी की जन्मभूमि भी स्थित है। अतः यह स्थल योग, अध्यात्म, संस्कृति एवं राष्ट्र चेतना का अद्भुत संगम है।

चौरासी कोसी परिक्रमा के समय यह क्षेत्र विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो जाता है। देश के विभिन्न स्थानों से आने वाले हजारों संन्यासी, वैरागी एवं तपस्वी यहाँ एकत्रित होकर आध्यात्मिक साधना, आराधना एवं योग साधना करते हैं। यह वातावरण मानव मन को प्रकृति, आत्मचिंतन और योग की ओर प्रेरित करता है।
कार्यक्रम के अंतर्गत माँ सरयू की पावन धारा में जल योग एवं प्लावनी मुद्रा का प्रशिक्षण कराया गया। उपस्थित योग साधकों को बताया गया कि पंचमहाभूतों में जल तत्त्व जीवन का मूल आधार है। मानव शरीर में जल तत्व शारीरिक संतुलन, कोशिकीय क्रियाओं, रक्त संचार, ताप नियंत्रण तथा मानसिक स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

योग दर्शन के अनुसार शरीर और प्रकृति दोनों पंचतत्त्वों से निर्मित हैं। जल के साथ योगिक सामंजस्य स्थापित करने से शरीर में अनुकूलन क्षमता बढ़ती है, मन शांत होता है तथा आंतरिक संतुलन विकसित होता है। जल योग वैज्ञानिक दृष्टि से श्वसन नियंत्रण, तंत्रिका तंत्र की शांति, मांसपेशीय विश्राम तथा मानसिक तनाव में कमी हेतु उपयोगी माना जाता है।

इस अवसर पर बच्चों एवं युवाओं को 12वें अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के मुख्य विषय “स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” के बारे में जानकारी दी गई। उन्हें बताया गया कि नियमित योगाभ्यास वृद्धावस्था में शरीर की कार्यक्षमता, लचीलापन, संतुलन, मानसिक स्वास्थ्य एवं जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाने में सहायक है।

योग के महत्व को स्पष्ट करते हुए योग परंपरा के सूत्रों का उल्लेख किया गया—

न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु
प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम्।”

अर्थात योग साधना से शरीर में ऐसी आंतरिक ऊर्जा एवं संतुलन विकसित होता है जो रोग, जरा एवं दुर्बलता पर नियंत्रण में सहायक होता है।

नाथ योग परंपरा में भी कहा गया है—
आसन दृढ़ आहार दृढ़
जो निद्रा दृढ़ होय
गोरख कहे सुनो रे पूता
मरे न बूढ़ा होय ।

जो व्यक्ति उचित आहार, आसन एवं संतुलित जीवनचर्या अपनाता है, वह दीर्घकाल तक स्वस्थ एवं ऊर्जावान जीवन जी सकता है।

कार्यक्रम में योगाभ्यासियों द्वारा सूर्य नमस्कार एवं कॉमन योग प्रोटोकॉल का अभ्यास किया गया। सभी योगाभ्यासियों में अत्यंत उत्साह देखा गया। उन सभी ने संकल्प लिया किया कि वे कॉमन योग प्रोटोकॉल को नियमित रूप से सीखेंगे, स्वयं अभ्यास करेंगे तथा जनमानस तक योग के स्वास्थ्य संदेश को पहुँचाने का कार्य करेंगे।
कार्यक्रम में कुल 77 योगाभ्यासियों ने सहभागिता की।
इस प्रकार जम्बू तीर्थ की पावन भूमि पर योग, जल, प्रकृति एवं आध्यात्मिक चेतना का समन्वय करते हुए यह कार्यक्रम जनस्वास्थ्य एवं योग जागरूकता की दिशा में एक प्रेरणादायी प्रयास रहा।


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