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May 17, 2023

वट सावित्री व्रत का महत्व,जानिए कब पड़ेगा यह महापर्व

 

वट सावित्री का महत्व


वट सावित्री एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है जो ज्येष्ठ मास के अमावस्या दिन मनाया जाता है। यह पर्व विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है और वे इसे बड़ी श्रद्धा और भक्ति से मनाती हैं।

वट सावित्री का महत्व हमारे पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। यह पर्व सत्यवान की पत्नी बनी सावित्री  की कथा से जुड़ा है। सत्यवान एक गरीब युवक थे जिनकी आपातकालीन मृत्यु के बावजूद सावित्री ने उनकी पत्नी के रूप में सत्यवान के प्राणों की रक्षा की। वे ब्रह्मा ऋषि के आशीर्वाद से आठ वर्ष तक निर्विघ्न विवाह के बाद सत्यवान के साथ व्रत और तप करती रहीं। उनकी निष्ठा, धैर्य और पतिव्रता ने यमराज को भी प्रभावित किया और वह सत्यवान की मृत्यु को रद्ध करके उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।

वट सावित्री के दिन विवाहित महिलाएं व्रत रखती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं। वे सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और तत्काल अन्न खाना छोड़ देती हैं। व्रत के दौरान, महिलाएं पूजा स्थल पर जाती हैं और वट वृक्ष को पूजती हैं। वे व्रत कथा का पाठ करती हैं और सावित्री और सत्यवान की कथा को सुनती हैं, जिससे उनके मन में पतिव्रता, प्रेम, और संकल्प की भावना जागृत होती है।


वट सावित्री का महिलाओं के जीवन में महत्व


वट सावित्री का महत्व विवाहित महिलाओं के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। इस उपवास से महिलाएं अपने पतियों के दीर्घायु, सुख, समृद्धि और सम्पूर्ण परिवार की कल्याण की कामना करती हैं। वे अपनी पति-पत्नी के रिश्ते की महत्वता को समझती हैं और प्रेम, समर्पण, और सहयोग के माध्यम से इसे मजबूत बनाने का संकल्प लेती हैं। वट सावित्री उपवास उन्हें अपने पति के प्रति विशेष प्रेम और समर्पण की भावना को स्थायी करने में मदद करता है।

इस दिन का पर्व सावित्री की उत्कृष्टता, धैर्य, और पतिव्रता को याद दिलाता है। यह महिलाओं को उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का आदर्श प्रदर्शित करता है और उन्हें उनके परिवार के साथी के योग्य बनाने में सहायता करता है। इस दिन महिलाएं दूसरों के लिए प्रेम और सेवा की भावना को मजबूत करती हैं और परिवार में एकता और सद्भावना का प्रतीक होती हैं। वट सावित्री उपवास महिलाओं के द्वारा एक आदर्श पत्नी और एक समर्पित जीवनसंगी का प्रतीक है। यह उन्हें अपने पति के प्रति प्रेम, सम्पूर्ण समर्पण और धैर्य की महत्वपूर्ण गुणों को बढ़ावा देता है। वट सावित्री उपवास के द्वारा, महिलाएं अपने पारिवारिक बंधनों को मजबूत बनाने के लिए संकल्प लेती हैं और पति के दीर्घायु, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं।



वट सावित्री की पौराणिक कथा


एक समय की बात है, एक गांव में सत्यवान नामक युवक रहता था। वह बहुत निष्कपट और निष्काम कर्मयोगी था। सत्यवान ने एक सुंदरी लड़की सावित्री से प्रेम किया और उसे अपनी पत्नी बनाया। दोनों ने सुख-शांति से अपने जीवन को बिताने का फैसला किया।

एक दिन सत्यवान जंगल में वनवास गुजार रहे थे। वहां उन्हें एक साधु मिला, जिसका नाम ब्रह्मा श्री नारायण था। ब्रह्मा ऋषि ने सत्यवान को बताया कि उसकी मृत्यु का समय निकट है और उसे सावित्री की कृपा से उच्च पद प्राप्त होगा। सत्यवान ने अपने अंतिम क्षणों में भी सावित्री के साथ रहने का निर्णय लिया।

सत्यवान जब वन में था, तभी यमराज आए और सत्यवान की आत्मा को लेने के लिए आगे बढ़े। सावित्री ने यमराज से मिलकर उन्हें सत्यवान की आत्मा वापस करने का अनुरोध िया। यमराज ने कहा कि वह असंभव है, लेकिन सावित्री अड़चन को नहीं मानी और पुनः अनुरोध किया। सावित्री ने कहा कि वह तीन पुत्र चहती हैं जिससे वह अपने पति के साथ खुश रह सके और संतान धारण कर सके। यमराज ने सावित्री की सत्यता, पराक्रम और पतिव्रता से प्रभावित होकर उसे वरदान देने का निर्णय लिया। इस तरह यमराज अपने वचनों से बांधे हुए और सावित्री को वरदान दिया। सावित्री ने अपनी पति की आत्मा को वापस लाई और वे दोनों वन में लौट आए।


वट सावित्री व्रत,समाज के लिए सीख


इस पर्व के माध्यम से, हमें संयम, सहनशीलता, और समर्पण की महत्वपूर्णता का अनुभव होता है। वट सावित्री हमें परिवार में सद्भावना, प्रेम, और सहयोग की महत्वपूर्णता का अनुभव दिलाता है और हमें एक अच्छा जीवनसंगी के लिए समर्पितता की प्रेरणा प्रदान करता है।

वट सावित्री का महत्व हमारे समाज के लिए आदर्शों और मूल्यों का महत्वपूर्ण स्रोत है। इस पर्व के माध्यम से हमें प्रेम, समर्पण, और पारिवारिक बंधनों की महत्वपूर्णता का अनुभव होता है। वट सावित्री उपवास और पूजा हमें अपने पति के प्रति आदर्श पत्नी की भूमिका को समझने में मदद करता है और हमें पारिवारिक संबंधों को मजबूत और समृद्ध बनाने का प्रेरणा देता है।

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